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Friday, February 25, 2022

कोविड के डर से कैंसर की अनदेखी न करें


वाराणसी: तेजी से फैलते ओमिक्रॉन वैरिएंट के कारण देश को कोविड की एक और लहर का सामना करना पड़ रहा है और इससे लोगों में कई तरह के खौफ और आशंकाएं घर करने लगी हैं। अच्छी बात यह है कि नए वैरिएंट से लगभग हर व्यक्ति प्रभावित होने के बाद घर पर रहते हुए ही कुछ ही दिन में रिकवर भी हो रहा है। इसके बावजूद हमें पूरी सावधानी बरतनी होगी क्योंकि मौजूदा लहर का सबसे बड़ा कारण ओमिक्रॉन वैरिएंट ही है और इस वजह से डेल्टा वैरिएंट के केस भी बने हुए हैं जिससे अधिक गंभीर बीमारी की आशंका बढ़ जाती है। 


ऐसे हालात में कैंसर मरीजों में संक्रमण बढ़ने का खतरा अधिक रहता है, उन्हें कोविड के डर से अपने कैंसर के इलाज की अनदेखी या देरी नहीं करनी चाहिए। पहले कभी कैंसर का इलाज करा चुके उन लोगों को भी चिंता रहती है जो अभी स्वस्थ हो चुके हैं। इसी तरह जिन मरीजों को डॉक्टरों ने कैंसर की आशंका बताई है, वे इस लहर के शांत पड़ने तक जांच कराने का इंतजार कर रहे हैं और कैंसर की पुष्टि में देरी कर रहे हैं। यह समझना बहुत जरूरी है कि जब कभी कैंसर की संदेह लगे, इसकी अनदेखी न करें और कोविड के लिए एहतियात बरतते हुए उचित जांच जरूर करा लें। 


हालिया रिपोर्ट बताती है कि मौजूदा लहर में कोविड संक्रमित 90 फीसदी से अधिक मरीज घर पर ही ठीक हुए हैं और इनमें से कुछ लोगों को ही अस्पताल जाने की जरूरत पड़ी है जबकि बहुत कम लोगों को गंभीर देखभाल की जरूरत पड़ी है। डेल्टा लहर के दौरान पर्याप्त इलाज के बावजूद मृत्यु दर लगभग 1.5 से 2 फीसदी रही है जो ओमिक्रॉन वैरिएंट संक्रमितों की तुलना में यह कम है। हालांकि कैंसर के इलाज में देरी करने पर यह बीमारी बढ़ती या फैलती ही जाती है और मरीज के स्वस्थ होने की संभावना कम होती जाती है। 


गुरुग्राम स्थित फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में सर्जिकल आॅन्कोलॉजी के प्रमुख निदेशक डॉ. वेदांत काबरा बताते हैं, 'हालांकि यह सच है कि कोविड—19 के कारण मृत्यु दर समेत अन्य परेशानियां इलाज करा रहे कैंसर मरीजों की तुलना में अधिक होती हैं क्योंकि इस तरह के इलाज में प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। लेकिन यह भी सच है कि इलाज करा रहे कैंसर मरीजों में कोविड—19 संक्रमण होने का खतरा अधिक रहता है। कैंसर मरीजों में कोविड—19 संक्रमण के कारण मृत्यु दर उच्च रक्तचाप, डायबिटीज या कार्डियक रोगों से पीड़ित मरीजों में बहुत कम होती है। इनमें से किसी रोग के साथ यदि दूसरा रोग भी है तो परेशानियां और बढ़ जाती हैं। लिहाजा ऐसे मरीजों को सलाह दी जाती है कि घबराए नहीं और अपना इलाज कराना जारी रखें। जिन मरीजों ने कम से कम तीन महीने पहले ही अपना इलाज पूरा करा लिया है, उन्हें आम आबादी की तुलना में कोई अतिरिक्त खतरा नहीं रहता है।' 


कैंसर मरीजों, कैंसर से उबरे लोगों और उनके तीमारदारों के बीच कोविड टीकाकरण को लेकर एक बड़ी समस्या है जिसमें इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा की जांच कर लेना जरूरी होता है। हालांकि अभी तक कैंसर मरीजों पर स्वीकृत टीकों के तत्काल सुरक्षा खतरे को लेकर कोई अध्ययन नहीं हुआ है लेकिन सलाह यही दी जाती है कि जिस टीके में जिंदा वायरस का प्रतिरूप नहीं बनने देने की क्षमता हो, इन मरीजों को वही लगाया जाए न कि वह टीका जिसमें जिंदा वायरस का प्रतिरूप बनने की क्षमता हो। 


हालांकि बड़े पैमाने पर हुए परीक्षणों में अभी तक कैंसर मरीजों को अलग रखा गया है लेकिन अमेरिका में हुए एक अध्ययन का प्रमाण मिला है कि ये टीके कैंसर मरीजों पर भी उतना ही असर करते हैं और दो खुराकों के बाद पर्याप्त एंटीबॉडी बनाते हैं। इसी तरह अन्य टीकों पर किए अध्ययन के नतीजे अभी उपलब्ध नहीं हैं लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि कैंसर मरीजों पर ये असर नहीं करते हैं। कैंसर मरीजों पर प्रतिरोधक क्षमता आम लोगों की तरह ही कुछ समय बाद बेअसर हो जाती है लिहाजा उन्हें पूर्ण टीकाकरण के बाद भी कोविड संबंधी सामान्य सावधानियां बरतनी होंगी। 


डॉ. काबरा बताते हैं, 'कैंसर संबंधी सभी बड़े गाइडलाइंस में भी कैंसर का इलाज कराते हुए मरीजों को टीका लगाने की सलाह दी गई है। दरअसल, इलाज करा रहे ऐसे मरीजों में कोविड—19 संक्रमण और इसकी परेशानियों का खतरा अधिक रहता है इसलिए उन्हें प्राथमिकता के आधार पर टीके लगवा लेने चाहिए। टीका लगाने की तारीख इलाज कार्यक्रम के बीच में ही तय कर लेनी चाहिए ताकि मरीज की प्रतिरक्षा प्रणाली से समझौता नहीं होने पाए। टीके लगवाने के लिए अपने कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर से एक बार सलाह जरूर ले लें। कैंसर की सर्जरी कराने जा रहे मरीजों को या तो सर्जरी से पहले या बाद में टीका लगवा लेना चाहिए। इसमें सर्जरी से पहले या बाद में पर्याप्त अंतराल जरूर होना चाहिए (आम तौर पर 2 सप्ताह लेकिन सर्जरी से एक हफ्ते पहले या मरीज में रिकवरी के अच्छे लक्षण दिखाई पड़ने पर सर्जरी के एक हफ्ते बाद)।'
अंतिम खुराक के बाद 2—3 हफ्ते तक अधिकतम सुरक्षा बनी रहती है लेकिन कैंसर मरीजों में सप्ताह के बाद ही टीके की प्रभावशीलता को लेकर कोई जानकारी नहीं मिली है। टीके से रोग और मृत्यु दर की गंभीरता जरूर कम देखने को मिली है लेकिन इसके बावजूद संक्रमित होने और दूसरे को संक्रमित करने की संभावना बनी रहती है। लिहाजा हर किसी को खासकर कैंसर मरीजों और उनके तीमारदारों को पर्याप्त एहतियात बरतते रहना चाहिए।

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